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ख़ास ख़बर  | 10.10.2008

वित्तीय संकट का भारत पर भी असर

विश्व के बाज़ारों में हो रही उथल-पुथल का असर अब भारत के बाज़ार और अर्थव्यवस्था पर नज़र आने लगा है.

शेयर बाज़ार के लिए यह सप्ताह पिछले कई सालों में सबसे अधिक ख़राब रहा। आज सुबह शेयर बाज़ार में कारोबार शुरू होते ही सेंसेक्स एक हज़ार अंक लुढ़क गया। दिन में वह कुछ संभला लेकिन अंततः उसमें आठ सौ से अधिक अंकों की गिरावट दर्ज हुई।

निवेशकों में घबराहट है और विदेशी निवेशक अपना पैसा यहाँ से निकाल कर अधिक सुरक्षित जगहों पर लगा रहे हैं। इस कारण बाज़ार में तरलता यानी नकदी की कमी पैदा हो गयी है।

इस कमी को पूरा करने के लिए आज भारतीय रिज़र्व बैंक ने कैश-रिज़र्व-रेशो यानी सी आर आर में एक प्रतिशत की और कमी कर दी। अभी चार दिन पहले उसने आधा प्रतिशत की कमी की घोषणा की थी। आज के निर्णय से बाज़ार में साठ हज़ार करोड़ रुपये आने की उम्मीद है।

आज केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अर्थव्यवस्था की मजबूती में विश्वास जताया और कहा कि घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है।  लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि औद्योगिक मंदी का संकट मंडराता दीखने लगा है।

अंग्रेज़ी कारोबारी दैनिक बिजिनेस स्टैण्डर्ड के कार्यकारी संपादक अशोक भट्टाचार्य का कहना है कि पूँजी बाज़ार के संकट का असर अब औद्योगिक परिदृश्य पर भी पड़ने लगा है।

पूर्व वित्त मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा का मानना है कि सरकार को सीआरआर में डेढ़ प्रतिशत की कटौती और करनी चाहिए, ब्याज दर को नीचे लाना चाहिए और अपने खर्च पर अंकुश लगाना चाहिए।

फिक्की के महासचिव अमित मित्र भी इसी राय के हैं। उनका कहना है कि ब्याज दर ऊंची होने के कारण इस समय शुरू होने जा रही परियोजनाएं रुकी पड़ी हैं क्योंकि वे आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर लगने लगी हैं। इसलिए सरकार को ब्याज दर कम करनी होगी और सीआरआर को घटाना होगा।

यदि देश औद्योगिक मंदी की चपेट में आ गया तो इसका असर आर्थिक विकास की दर पर भी पड़ कर रहेगा।

कुलदीप कुमार, नई दिल्ली

 
 

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