प्रेस समीक्षा | 10.10.2008
नैनो परियोजना जर्मन मीडिया के नैनों में
नैनो परियोजना सिंगूर से साणंद क्या गई, भारत से लेकर जर्मन मीडिया तक में छा गई. हालांकि इस हफ़्ते भारत अमेरिकी परमाणु क़रार और पाकिस्तान में आईएसआई प्रमुख बदले जाने पर भी जर्मन मीडिया की नज़र रही.
टाटा ने अपनी छोटी कार नैनो परियोजना को पश्चिम बंगाल के सिंगुर में लगाने का विचार त्याग दिया है और अब गुजरात में अपना संयंत्र लगाने की तैयारी में है. इस पर बर्लिन के टागेसत्साइटुंग ने लिखाः
"किसानों
Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: डील पर सीलकी लड़ाई उद्योग जगत के साथ. यह एक ऐसी लड़ाई है, जिसने भारत में औद्योगिक परियोजनाओं को अनेक बार रोका है और पिछले कुछ वर्षों में और भी तीव्र हो गयी है... 90 वाले दशक में भारत ने अपने बाज़ार का उदारीकरण किया. तब से अरबों डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है और देश के महानगरों में एक अपूर्व आर्थिक धूम को जन्म दिया है. लेकिन, किसान और भी ग़रीब हुए हैं, क्योंकि पश्चिमी देशों से आयातित सस्ते खाद्यपदार्थों ने क़ीमतें गिरा दी हैं. और अब उन्हें औद्योगिक परियोजनाओं के कारण अपनी भूमि खोने का भी डर लगने लगा है."
भारत सरकार देश में कम से कम 500 विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की सोच रही है और इसके लिए डेढ़ लाख हेक्टयर ज़मीन ख़रीदेगी. बर्लिन के साप्ताहिक फ्राइटाग का कहना है कि इससे एक लाख 14 हज़ार किसान परिवारों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ सकता हैः
"उच्च वर्ग और विशिष्ट वर्ग की संपन्नता के बीच भारत में भूख और ग़रीबी पूरे विश्व में भुखमरी का पर्याय बन गयी है. इसके पीछे है नये उभर रहे देशों में कृषि की दशकों से हो रही उपेक्षा. वहाँ के दिग्भ्रमित राजनेता लकीर के फ़कीर की तरह अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं की सलहों पर चलते रहे हैं. ब्रिटिश सहायता संस्था ऑक्सफ़ैम की एक रिपोर्ट दिखाती है कि स्वयं भारत में बड़े कृषि-उत्पादकों की तुलना में छोटे किसान प्रतिहेक्टर अक्सर अधिक पैदावार करते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि वे स्थानीय बाज़ार के लिए स्थानीय पसंद की चीज़ें उगाते हैं. उनके उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में न तो कोई मांग है और न उनसे क़ीमतें ऊपर चढ़ती हैं."
सप्ताह के आरंभ में अमेरिका
Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: आईएसआई में बदलावकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस की दिल्ली यात्रा के दौरान भारत अमेरिकी परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने वाले थे, लेकिन भारत ने यह समारोह अचानक रद्द कर दिया. स्विट्ज़रलैंड का नोए त्स्युइरिशर त्साइटुंग इसके पीछे भारत के घरेलू राजनीति को कारण समझता हैः
"अमेरिका के साथ समझौते को लेकर भारत में विवाद है... लगता है कि सरकार अपने विरोधियों को अतिरिक्त गोला-बारूद नहीं देना और इस आलोचना से बचना चाहती थी कि समझौते को बहुत ज़ल्दबाज़ी में लागू किया जा रहा है."
अख़बार का कहना है कि अंतिम क्षण में हस्ताक्षरण समारोह को रद्द करना, कूटनीतिक दृष्टि से बहुत ही अशोभनीय कहा जायेगाः
"राइस आधी दुनिया पार कर भारत नहीं जातीं, यदि उन्हें समय रहते इसकी ख़बर मिल गयी होती. पिछले वर्षों में उन्होंने अमेरिका को भारत के निकट लाने के लिए बहुत कुछ किया है. राष्ट्रपति बुश ने भी, जिनकी विदेश नीति बहुत सफल नहीं रही है, भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए बहुत दिल से काम किया है और उसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं."
अंत में पाकिस्तान. ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग का मत है कि जनरल अहमद शुजा पाशा को सैनिक गुप्तचर सेवा आईएसआई का महानिदेशक बनाया जाना एक अच्छा समाचार हैः
"देश के नामी सैन्य विशेषज्ञ प्रगति की सीढ़ियां चढ़ने वाले इस 56 वर्षीय फ़ौजी को बहुत कुशल और इस्लामी अदिवादियों के विरूद्ध लड़ने के लिए कटिबद्ध अफ़सर बताते हैं. पाशा के बारे में पता है कि उन्हें सेना का विश्वास प्राप्त है. यह एक बहुत बड़ी बात है. सेनाध्यक्ष अशफ़ाक़ परवेज़ कियानी सुरक्षा तंत्र के महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे विश्वासपात्रों को बैठा रहे हैं, जिन पर इस्लामवादियों के साथ मिलीभगत का शक नहीं है. पाशा के साथ उनके रिश्ते इतने घनिष्ठ हैं कि वे अमेरिकी सेनाध्क्ष जनरल माइक मलन से जब भी मिले हैं, पाशा को साथ लेकर आये हैं. पिछले 10 महीनों में ऐसी छह मुलाक़ातें हुई हैं."


















